सुदूर हिमालय का यह उत्पात
किन्नौर की वह खूबसूरत घाटी कभी कभार धमाकों की आवाज़ से गूँज उठती थी। कुछ रोज ये धमाके देर रात भी सुनाई दिए। कारण बेहद व्यथित करने वाला था। पर क्या किया जा सकता है? मानव कल्याण की कीमत तो चुकानी ही होगी!
किन्नौर की वह खूबसूरत घाटी कभी कभार धमाकों की आवाज़ से गूँज उठती थी। कुछ रोज ये धमाके देर रात भी सुनाई दिए। कारण बेहद व्यथित करने वाला था। पर क्या किया जा सकता है? मानव कल्याण की कीमत तो चुकानी ही होगी!
सावन की वर्षा और यथार्थ की बारिश कितनी अलग हैं। कविताओं, कहानियों व गीतों का सावन सपने जगाता है। यथार्थ का सावन मुँह चिढ़ाता है। उसी चिढ़ावन पर कुछ पंक्तियाँ।
लोकतंत्र लोक से चलता है। पर लोक कैसे चलता है? प्रचार से? अधिप्रचार से? या समझ बूझ से – यथार्थ की निष्पक्ष समीक्षा करते हुए उज्वल और ईमानदार भविष्य के व्यावहारिक सपने बुनता हुआ!
खलील गिबरान की एक मशहूर कविता है ‘ऑन चिल्ड्रन’। यह कविता दीप्ति व मेरी तब भी प्रिय थी जब हम माता पिता नहीं बने थे, और आज भी है। जब भी मन संशय में होता है तो हम इसे पढ़ लेते हैं। कविता का यह हिन्दी अनुवाद इसलिए ताकि आवाज़ दूर तक जा सके।
मेरी डायरी में बंद कविताएँ मैंने एक दो लोगों को छोड़ कभी किसी के साथ साझा नहीं की। कोशिश है की उनमें से कुछ, संदर्भ के साथ, यहाँ प्रकाशित करूँ। इसलिए pangti.in की शुरुआत अपनी लिखी पहली कविता से कर रहा हूँ।