बच्चों के बाबत

खलील गिबरान की एक मशहूर कविता है ‘ऑन चिल्ड्रन’। यह कविता दीप्ति व मेरी तब भी प्रिय थी जब हम माता पिता नहीं बने थे, और आज भी है। जब भी मन संशय में होता है तो हम इसे पढ़ लेते हैं। कविता का यह हिन्दी अनुवाद इसलिए ताकि आवाज़ दूर तक जा सके।

खलील गिबरान का जन्म 1883 में हुआ था। वो लेबनानी मूल के थे। जब वे बारह वर्ष के थे तो अपनी माता व भाई बहिनों के साथ अमेरिका चले। अमरीकी अंग्रेजी में उनका नाम का उच्चारण गिबरान की जगह जिबरान है। खलील गिबरान एक लेखक, कवि, चित्रकार व छायाकार थे। लोग उन्हें दर्शनशास्त्री मानते हैं पर उनको यह खिताब पसंद नहीं था। उनकी सबसे मशहूर व चर्चित किताब ‘द प्रौफेट’ (1923) है जो दुनिया भर में सौ से अधिक भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है। ‘ऑन चिल्ड्रन’ कविता भी इसी पुस्तक का भाग है।

बच्चों की परवरिश पर लिखे गए ये शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने शायद सौ साल पहले थे। मुझे तो लगता है की आज के परिवेश में इस कविता की प्रासंगिकता काफी बढ़ गई है, खासकर तब जब बच्चे किशोरावस्था में पदार्पण करते हैं।

बच्चों के बाबत

तुम्हारे बच्चे तुम्हारे नहीं हैं
वे तो जीवन की जिजीविषा की संतानें हैं।
वे तुम्हारे जरिए आए जरुर हैं, पर तुमसे नहीं;
वे तुम्हारे साथ हैं पर उन पर तुम्हारी मालकियत नहीं हैं।

तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो पर विचार नहीं,
क्योंकि उनके खुद के अपने विचार हैं।
तुम उनके शरीर को आशियाना दे सकते हो पर आत्मा को नहीं,
क्योंकि उनकी आत्माओं का निवास भविष्य में है,
जहाँ तुम स्वप्न में भी पहुँच नहीं सकते।
तुम उनके जैसा बन सकते हो शायद,
पर उन्हें अपने सा बनाने की नहीं कोशिश मत करना,
क्योंकि जीवन अग्रगामी है, पश्चगामी नहीं।

तुम तो वह धनुष हो जिससे तुम्हारे बच्चे
जिंदा तीरों की तरह छोड़े जाते हैं।
धनुर्धर को दृष्टिगोचर है अनंत का वह लक्ष्य
जिसके लिए खींचता है वह तुम्हें, अपनी पूरी शक्ति से,
ताकि तीर पूर्ण तीव्रता से बहुत दूर तक जा सके।
इस खिंचाव, इस झुकाव का आनंद ग्रहण कर लो,
क्योंकि धनुर्धर को जितना तीरों की गति से प्रेम है,
उतना ही प्रिय है उसे अपने धनुष का स्थायित्व!


मूल अंग्रेजी कविता

On Children

Your children are not your children.
They are the sons and daughters of Life’s longing for itself.
They come through you but not from you,
And though they are with you yet they belong not to you.

You may give them your love but not your thoughts,
For they have their own thoughts.
You may house their bodies but not their souls,
For their souls dwell in the house of tomorrow,
Which you cannot visit, not even in your dreams.
You may strive to be like them,
But seek not to make them like you.
For life goes not backward nor tarries with yesterday.

You are the bows from which your children
As living arrows are sent forth.
The archer sees the mark upon the path of the infinite,
And He bends you with His might
That His arrows may go swift and far.
Let your bending in the archer’s hand be for gladness;
For even as He loves the arrow that flies,
So He loves also the bow that is stable.

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3 Responses

  1. Girija says:

    बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति।

  2. राजेश जो. says:

    बेहतरीन कविता का बेहतरीन अनुवाद, नवीन भाई। आनंद आ गया।

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