अछूत पंडित
दिन भर, बेखौफ, यहाँ वहाँ की खाक छान कर पंडितजी शाम को जबरदस्त पूजा अर्चना करते थे। बावजूद उसके पण्डितजी को कोविड हो गया। बात बिगड़ी, पर उतनी नहीं की अस्पताल जाना पड़े।
दिन भर, बेखौफ, यहाँ वहाँ की खाक छान कर पंडितजी शाम को जबरदस्त पूजा अर्चना करते थे। बावजूद उसके पण्डितजी को कोविड हो गया। बात बिगड़ी, पर उतनी नहीं की अस्पताल जाना पड़े।
बचपन से ही लोगों को कहते हुआ सुना है – मितभाषी बनो! कम बोलो, अच्छा बोलो! कई मायनों में यह बात सही है। पर कई मायनो में गलत भी। कम बोलना अच्छी बात है। पर केवल तब तक, जब तक मन मस्तिष्क सुन्न नहीं हैं।
लोकतंत्र लोक से चलता है। पर लोक कैसे चलता है? प्रचार से? अधिप्रचार से? या समझ बूझ से – यथार्थ की निष्पक्ष समीक्षा करते हुए उज्वल और ईमानदार भविष्य के व्यावहारिक सपने बुनता हुआ!
खलील गिबरान की एक मशहूर कविता है ‘ऑन चिल्ड्रन’। यह कविता दीप्ति व मेरी तब भी प्रिय थी जब हम माता पिता नहीं बने थे, और आज भी है। जब भी मन संशय में होता है तो हम इसे पढ़ लेते हैं। कविता का यह हिन्दी अनुवाद इसलिए ताकि आवाज़ दूर तक जा सके।
जब चारों दिशाओं में हाहाकार मचा हो, हर तरफ से दुख की ही खबरें आ रहीं हो तब व्याकुल मन उस अंधकार में रोशनी तलाशने निकलता है। क्योंकि रोशनी के बिना अंधकार संभव ही नहीं। एक ऐसी ही रोशनी की लघु कथा।
मेरी डायरी में बंद कविताएँ मैंने एक दो लोगों को छोड़ कभी किसी के साथ साझा नहीं की। कोशिश है की उनमें से कुछ, संदर्भ के साथ, यहाँ प्रकाशित करूँ। इसलिए pangti.in की शुरुआत अपनी लिखी पहली कविता से कर रहा हूँ।