ख़ामख़ा

यह कहानी ख़ामख़ा की है। और शायद नहीं भी। एक जाने माने सूफी कव्वाल के मुँह से सुनी थी मूल कहानी। पता नहीं यह कहानी किसने और कब लिखी पर जब भी लिखी बेमिसाल लिखी। यह उसी अद्भुत कहानी का पुनःकथन है।


यह कहानी ख़ामख़ा की नहीं है क्योंकि यहाँ ख़ामख़ा का मतलब यह नहीं कि फलां व्यक्ति ख़ामख़ा ही खुद को भगवान मानता है। या कि फलां व्यक्ति की ख़ामख़ा ही ताजपोशी हो रही है जबकी राजधानी अभी दूर है। या कि राजसत्ता खत्म हो चुकी है फिर भी राजकुमार ख़ामख़ा ही राजा बनने का ख्वाब देख रहा है। या कि कुछ बेईमान ख़ामख़ा ही ईमानदारों के गुट में शामिल हो अलग राग अलाप रहे हैं।

यह कहानी है एक मक्खी की जिसका नाम ख़ामख़ा है। एक ऐसी मक्खी जो मक्खियों की रानी है। वैसे तो मक्खियों की कौम ही ख़ामख़ा होती है। ख़ामख़ा इसलिए क्योंकि वे बेहूदी होती है। वे हमेशा भूखी होती है पर उनको दाँत नहीं होते। क्योंकि वे हमेशा भूखी होती है इसलिए हमेशा खाना तलाशती हैं। और जब खाना मिल जाता है तो पहले उस पर थूकती हैं। फिर अपने थूके को पाँव से रौंदती हैं और उससे बनी लुगदी को स्ट्रॉ से चूस जाती हैं। और फिर निकल जाती है अगले खाने वाली चीज की तलाश में। उनके थूकने, लुगदी बनाने और चूसने का सिलसिला दिन भर चलता रहता है। वह खाने पर भी बैठती हैं और पाखाने पर भी इसलिए किटाणुओं को मुफ़्त सवारी मिल जाती हैं। उनकी इन बेतुकी हरकतों का विभिन्न खाद्य चक्रों में क्या स्थान है यह आज तक पता नहीं चल सका है।

मक्खियों के इस फालतूपने के कारण मनुष्य हमेशा मक्खियों को मारने के फेर में रहता है। कभी उपकरण से तो  कभी जहर से। मनुष्य अमूमन उन्हें देखते ही भड़क जाता है। मक्खियाँ मनुष्य का खून नहीं चूसती पर फिर भी शरीर पर बैठती हैं और कान में भिनभिनाती है, शायद यह बताने के लिए कि वे हमारी नाराजगी से नाराज हैं।

मक्खियाँ इस बात से भी नाराज हैं कि लोग उनकी सुंदरता को नज़रन्दाज़ कर केवल तितलियों के पीछे भागते है। मक्खियों के सुंदर पारदर्शी पंखों को अनदेखा कर घिनोंने पतंगों पर शायरियाँ लिखते है। सब कुछ होते हुए भी वे कुछ नहीं हैं। अपनी कौम की इस उपेक्षा से खिन्न हो कर एक दिन मक्खियों की रानी ख़ामख़ा ने तय किया की वह पतंगों के राजा के पास जाएगी और सवाल करेगी कि उन्हें अनदेखा क्यों किया जाता है? क्यों कुछ ना होते हुए भी पतंगों पर शायरियाँ लिखी जातीं हैं?

ख़ामख़ा के सवाल सुन पतंगों का राजा मुस्कुराया। उसे यूँ मुस्कुराता देख ख़ामख़ा को गुस्सा आया और थोड़ी ऊँची आवाज में बोली, “तुम पतंगे रोशनी ढूँढने के अलावा करते ही क्या हो? और रोशनी ढूँढने में ऐसी क्या बड़ी बात है? वह तो हम भी ढूँढ लें, शायद तुमसे भी जल्दी! चाहो तो प्रतियोगिता कर लो।”

पतंगों के राजा ने बात टालने की बहुत कोशिश की पर ख़ामख़ा अपनी बात पर अड़ी रही। जब मुक्ति का कोई द्वार न दिखा तो पतंगों का राजा ख़ामख़ा की बात मान गया। प्रतियोगिता अगली शाम के लिए तय कर दी गई। तय हुआ की मक्खियाँ और पतंगे एक साथ रोशनी ढूँढने निकलेंगे और जो सबसे पहले सबसे ज्यादा रोशनी ढूँढ लेगा उसके सिर ताज होगा।

अगली शाम, सूरज ढलते ही, सभी रोशनी ढूँढने निकले। मक्खियाँ तेजी से उड़ रोशनियाँ ढूँढने लगीं। उन्होंने मंदिर के दिए भी देखे और घरों में जलते चूल्हों की लपटें भी। उन्होंने बाजार की लालटेनें भी देखीं और शमशान की आग भी। उन्होंने मोमबत्तियाँ भी देखीं और मशालें भी। पूरे इलाके की हर रोशनी को ढूँढ वे वापस उड़ चली, पतंगों के राजा के पास। वे सभी यह देख कर बहुत खुश हुई की एक भी पतंगा अब तक वापस नहीं आया है। ख़ामख़ा के चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान आ गई – जीत की मुस्कान। सभी मक्खियाँ एक दूसरे की पीठ थपथपाने लगीं। वे ख़ामख़ा की जय जयकार भी करने लगीं। मक्खियाँ बहुत खुश थीं कि आज उन्हें समाज में अपना जायज़ हक मिल जाएगा।

अपनी जयजयकार के बीच ख़ामख़ा की नजरें कई बार पतंगों के राजा से मिलीं जो मंद मंद मुस्कुरा रहा था। ख़ामख़ा को उसकी यह हरकत ख़ामख़ा की लगी इसलिए उसने मक्खियों को शान्त हो जाने का इशारा किया और पतंगों के राजा से बोली, “अपनी हार पर क्यों मुस्कुरा रहे हो राजा? आज तो तुम्हारी सत्ता गई। तुम्हारा एक भी पतंगा अभी तक वापस नहीं आया। इतनी देर में तो हमारी सबसे निकम्मी मक्खी अकेले ही सारी रोशनियाँ ढूँढ आती।”

ख़ामख़ा की बात सुन सभी मक्खियाँ हँस दी पर पतंगों का राजा कुछ नहीं बोला। वह बस मुसकुराता रहा। यह देख ख़ामख़ा गुस्से में आ गई और चिल्लाती हुए सा बोली, “अब यूँ ही मुस्कुराते रहोगे या कुछ बोलोगे भी? या इस हार ने तुम्हारी बोलती बंद कर दी है?”

पतंगों का राजा होले से बोला, “अब तुम्हें क्या समझाऊँ ख़ामख़ा। मेरी बात शायद ख़ामख़ा की लगे पर हो सके तो बात की गहराई समझने की कोशिश करना। जिसे रोशनी मिल जाती है ना, वह कभी वापस नहीं आता। वह तो रोशनी में फ़ना हो जाता है!”

3 Responses

  1. बटरोही says:

    नीतिकथा सी लगती यथार्थ जीवन की प्रतीकात्मक कहानी। अरसे बाद इतनी बढ़िया कहानी पढ़ी।

  2. Shivender Singh says:

    ज्ञान की सार्थकता जानने का सुन्दर उदाहरण

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