उत्तराखंड

सोने का अंडा देने वाली मुर्गी

सब जगह का होते हुए भी कहीं का ना होता हुआ एक पुराना गाँव है। पहाड़ की चोटी पर बसे इस पुराने गाँव में एक पुराना आदमी रहता था – रमदा। रमदा के जमाने में कृषि वैज्ञानिक पैदा नहीं हुए थे इसलिए पहाड़ की चोटी पर भी खेती होती थी।

शुन्य की आबादी वाले गाँव की अकेली नदी

पहाड़ों में सफर करते हुए कई बार ऐसे गाँव दिखाई पड़ जाते हैं जो होते भी हैं और नहीं भी। क्षतिग्रस्त मकानों और बंजर खेतों वाले इन पगडंडी विहीन गाँवों को देख कर लगता है मानो उनका समय अतीत में कहीं थम सा गया है।

किसका पहाड़

पहाड़ भी महज एक कोना ही तो है इस संसार का। उसे भी दुनिया वैसी ही दिखाई देती है जैसी बाकि सब को। इसीलिए पहाड़ भी वक्त जाया करता है इस संवाद में कि यह जमीन किसकी है, यह संस्कृति किसकी है…

फ्यूंली

कहते हैं की हर दस किलोमीटर में भाषा का स्वरुप बदल जाता है। मुहावरे और लोकोक्तियाँ बदलने लगती हैं। कुछ ऐसा ही लोक कथाओं के साथ भी होता है जो जगह और समय के अनुसार अपने को नए रंग में ढाल लेतीं हैं। ऐसी ही एक अद्भुत कथा है फ्यूंली की।